Local Government in India in hindi
भारत में स्थानीय शासन (Local Government in India)
परिचय
स्थानीय शासन (Local Government) लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर प्रशासनिक सशक्तिकरण प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह शासन प्रणाली गांधीजी के ग्राम स्वराज के सिद्धांत को साकार करने में सहायक है।
✅ भारतीय संविधान में स्थानीय शासन का उल्लेख भाग IX (अनुच्छेद 243 से 243O) और भाग IXA (अनुच्छेद 243P से 243ZG) में किया गया है।
✅ संविधान (73वां और 74वां संशोधन) अधिनियम, 1992 के तहत पंचायती राज व्यवस्था और नगर पालिका प्रणाली को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
1️⃣ भारत में स्थानीय शासन का इतिहास
📌 प्राचीन काल:
- वैदिक काल में “सभा” और “समिति” स्थानीय प्रशासन का कार्य करती थीं।
- चोल वंश (दक्षिण भारत) में एक संगठित पंचायत प्रणाली विकसित हुई थी।
📌 ब्रिटिश काल:
- 1882 – लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वशासन की नींव रखी (पंचायती राज के जनक)।
- 1919 का मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार – स्थानीय शासन को प्रांतीय विषय बनाया।
- 1935 का भारत सरकार अधिनियम – स्थानीय सरकारों को अधिक वित्तीय एवं प्रशासनिक शक्तियाँ दी गईं।
📌 स्वतंत्रता के बाद:
- 1957 – बलवंत राय मेहता समिति ने “तीन-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली” की सिफारिश की।
- 1977 – अशोक मेहता समिति ने “दो-स्तरीय पंचायत प्रणाली” की सिफारिश की।
- 1992 – 73वां और 74वां संवैधानिक संशोधन लागू हुआ।

2️⃣ पंचायती राज व्यवस्था (Panchayati Raj System) – ग्रामीण स्थानीय शासन
📌 73वां संवैधानिक संशोधन (1992) के तहत पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
✅ संविधान में प्रावधान:
- अनुच्छेद 243 से 243O – पंचायती राज प्रणाली।
- अनुच्छेद 40 – राज्य नीति के निदेशक तत्व में पंचायती राज का उल्लेख।
- ग्यारहवीं अनुसूची – पंचायतों के कार्यों का उल्लेख।
✅ तीन-स्तरीय संरचना:
1️⃣ ग्राम पंचायत (Village Panchayat) – ग्राम स्तर पर।
2️⃣ पंचायत समिति (Panchayat Samiti) – ब्लॉक/तालुका स्तर पर।
3️⃣ जिला परिषद (Zila Parishad) – जिला स्तर पर।
📌 मुख्य विशेषताएँ:
- ग्राम सभा: प्रत्येक गाँव के सभी वयस्क नागरिकों की सभा।
- प्रत्यक्ष चुनाव: पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों का सीधा चुनाव।
- अनुसूचित जाति/जनजाति एवं महिलाओं के लिए आरक्षण।
- राज्य वित्त आयोग: प्रत्येक पांच वर्ष में वित्तीय समीक्षा।
- राज्य निर्वाचन आयोग: पंचायत चुनावों की देखरेख।
📌 महत्वपूर्ण सिफारिशें:
👉 बलवंत राय मेहता समिति (1957) – तीन-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली।
👉 अशोक मेहता समिति (1977) – दो-स्तरीय प्रणाली।
👉 जी.वी.के. राव समिति (1986) – पंचायतों को वास्तविक सशक्तिकरण।
👉 एल.एम. सिंघवी समिति (1986) – पंचायतों को संवैधानिक दर्जा।
3️⃣ नगर पालिका प्रणाली (Municipal System) – शहरी स्थानीय शासन
📌 74वां संवैधानिक संशोधन (1992) के तहत नगर पालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
✅ संविधान में प्रावधान:
- अनुच्छेद 243P से 243ZG – नगर पालिका प्रणाली।
- बारहवीं अनुसूची – नगर पालिकाओं के कार्यों का उल्लेख।
✅ तीन-स्तरीय संरचना:
1️⃣ नगर पंचायत (Nagar Panchayat) – छोटे कस्बों के लिए।
2️⃣ नगर पालिका (Municipality) – मध्यम आकार के शहरों के लिए।
3️⃣ नगर निगम (Municipal Corporation) – बड़े शहरों के लिए।
📌 मुख्य विशेषताएँ:
- नगरपालिका के प्रमुख (Mayor/Chairperson) का चुनाव।
- अनुसूचित जाति/जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण।
- राज्य वित्त आयोग एवं राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना।
- नगर निगमों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता।
📌 महत्वपूर्ण सुधार:
👉 राष्ट्रीय नगर रोजगार गारंटी योजना (NULM) – शहरी गरीबों के लिए।
👉 स्मार्ट सिटी मिशन – नगरों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना।
4️⃣ स्थानीय शासन की चुनौतियाँ
❌ वित्तीय संसाधनों की कमी: पंचायतों और नगरपालिकाओं के पास कर लगाने की सीमित शक्तियाँ।
❌ राज्य सरकार का हस्तक्षेप: कई राज्यों में स्वायत्तता की कमी।
❌ शिक्षा और जागरूकता की कमी: कई क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों की प्रशासनिक समझ कमजोर है।
❌ भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की समस्या: वित्तीय अनियमितताओं के मामले।
❌ नगरीय समस्याएँ: शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति, कचरा प्रबंधन और यातायात समस्याएँ।
5️⃣ सुधार और सिफारिशें (Reforms & Recommendations)
✅ स्थानीय निकायों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता दी जाए।
✅ राजनीतिक हस्तक्षेप को कम किया जाए।
✅ सूचना प्रौद्योगिकी (IT) का उपयोग कर पारदर्शिता बढ़ाई जाए।
✅ नगरपालिका और पंचायत प्रतिनिधियों को बेहतर प्रशिक्षण दिया जाए।
✅ सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP Model) को बढ़ावा दिया जाए।
📌 सिफारिशें:
👉 द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2005) – ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देना।
👉 राष्ट्रीय पंचायती राज नीति (2010) – पंचायती राज संस्थाओं को और सशक्त बनाना।
🔍 निष्कर्ष
📌 स्थानीय शासन प्रणाली लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (Decentralization) का एक प्रमुख उदाहरण है।
📌 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन ने भारत में ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को मजबूती प्रदान की।
📌 हालांकि, वित्तीय, प्रशासनिक और भ्रष्टाचार संबंधी समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं, जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है।
FAQ
1. स्थानीय सरकार क्या होती है?
2. भारत में स्थानीय शासन के दो प्रमुख प्रकार कौन से हैं?
उत्तर:
-
ग्रामीण स्थानीय शासन – जिसे पंचायत राज कहा जाता है (तीन स्तरीय: ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद)
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शहरी स्थानीय शासन – नगर पालिका, नगर परिषद, और नगर निगम
3. पंचायत राज व्यवस्था की शुरुआत कब और कैसे हुई?
उत्तर:
पंचायती राज व्यवस्था की औपचारिक शुरुआत 1992 में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत हुई, जिससे ग्राम पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला।
4. नगर निकाय क्या होते हैं?
उत्तर:
नगर निकाय शहरी क्षेत्रों के लिए बनाए गए स्थानीय सरकारी संस्थान होते हैं। इनमें शामिल हैं:
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नगर पालिका (Municipality)
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नगर निगम (Municipal Corporation)
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नगर पंचायत (Nagar Panchayat)
5. पंचायतों और नगर निकायों के क्या कार्य होते हैं?
उत्तर:
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स्वच्छता, जल आपूर्ति, स्ट्रीट लाइट्स
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स्थानीय सड़कों का रख-रखाव
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प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं
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विवाह, जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करना
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स्थानीय कर और शुल्क एकत्रित करना
6. क्या स्थानीय निकाय चुनाव होते हैं?
उत्तर:
हाँ, स्थानीय निकायों के सदस्य हर 5 वर्ष में चुने जाते हैं। यह चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से राज्य निर्वाचन आयोग के द्वारा कराए जाते हैं।
7. स्थानीय सरकार का वित्त पोषण कैसे होता है?
उत्तर:
स्थानीय सरकारों को राज्य सरकार, केंद्र सरकार, स्थानीय करों (जैसे हाउस टैक्स, वाटर टैक्स), और अन्य शुल्कों से राजस्व प्राप्त होता है।
8. 74वां संविधान संशोधन किससे संबंधित है?
उत्तर:
74वां संशोधन अधिनियम (1992) शहरी स्थानीय शासन को संवैधानिक दर्जा देता है। इसके तहत नगर निकायों की संरचना, कार्य और शक्तियों का प्रावधान है।
9. ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में क्या अंतर है?
उत्तर:
-
ग्राम सभा: ग्राम के सभी पंजीकृत मतदाताओं की सभा है।
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ग्राम पंचायत: ग्राम सभा द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का निकाय, जो ग्राम का प्रशासन चलाता है।
10. क्या महिलाओं के लिए आरक्षण है?
उत्तर:
हाँ, पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं के लिए कम से कम 33% सीटें आरक्षित होती हैं। कुछ राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50% तक कर दिया है।